Tuesday, October 2, 2012

309

आज मैं अपने सेक्टर के 309 नंबर मकान की घंटी बजा कर भाग आया ।
दूर एक गली में घुसकर, खम्बे के पीछे खडा हांफता रहा।
कुछ देर झाँक कर देखता रहा 309 के गेट से निकली आंटी को,
जो दायें बायें घंटी बजाने वाले को ढूंढ रहीं थीं।
उनके बुदबुदाते हुए अन्दर चले जाने तक मैं वहीँ खड़ा रहा और फिर अपनी शरारत पर मुस्कुराते हुए घर लौट आया।

आज दस साल के बाद मैंने ऐसी हरकत की थी।
दस साल के बाद आज मैं इतनी तेज़ भागा था।
दस साल के बाद मैं आज अपनी ही हरकत पर इतने जोर से हंसा था।
हँसते हँसते दौड़ा आज मैं दस साल बाद था। मैंने खुद के हांफने की आवाज़ दस साल बाद सुनी थी।

पर हाँ, कुछ मामूली सा फर्क था ...
इस बार की मेरी शरारत में अर्जुन, केतन, अंकित साथ नहीं थे।
इस बार डर कुछ ज्यादा लगा था, और ठहाके ज़रा कम निकले थे।
309 से निकली आंटी बदल चुकी थी, और उस गेट के पीछे खड़े मकान का नक्शा भी।

एक फर्क और था ...
इस बार मैंने सिर्फ सोचा भर था।