इस भीड़ की जैसे आदत सी हो गयी है.
यह शोर-शराबा, यह हर पल त्यौहार,
चीखना-चिल्लाना, भोंपू की आवाज़,
यह गाड़ियों के होर्न और पहियों की चीखें
हर तरफ दौड़ते लोग, रफ़्तार से होते काम.
इन् सब से एक अनचाही दोस्ती-सी हो गई है.
जैसे उस नाक-खुरेदते मोटे लड़के से हो गयी थी
जिसे teacher ने ज़बरदस्ती 'bench -partner ' बना दिया था.
ऐसे में, तीन पल सन्नाटा मिल जाए कहीं
तो हज़म नहीं होता.
एक अजीब सी बेचैनी भर आती है मन में,
और उसी शोर-ओ-गुल भरे मेले की तरफ दौड़ने को जी करता है.
यह जानते हुए भी,
की यह खामोशी खूबसूरत है.
दरअस्ल इस मेले की भीड़ में
खुद को खुद से ही कहीं खो दिया है.
खामोशी की भारी धुंध इस भीढ़ को अगर छुपा दे,
अपना वो भूला-बिसरा सा चेहरा अपने साथ आ खड़ा होगा.
यह काफी डरावना हो सकता है
खुद को इतने करीब से देखने की आदत न रही हो तो.
मन मचल कर वापिस मेले की तरफ भागता है,
उस सच्ची खूबसूरती से घबराता है.
भीड़ में फिर खुद को खो दे,
तब उस शोर में, उसके अन्दर का कौतुहल
फिर शांत होता है.
- 'नूर'
